दिल्ली में चुनाव संपन्न। दिग्गजों की किस्मत ईवीएम में कैद। शाम 5 बजे तक 57.70 फीसदी वोटिंग
दिल्ली में मतदाताओं ने नई सरकार का चुनाव करने के लिए 699 उम्मीदावारों की किस्मत वोटिंग मशीन में कैद कर दी है । प्रमुख दलों की बात करें तो इस चुनाव में आप और कांग्रेस ने सभी 70 सीटों पर तो भाजपा ने 68 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। भाजपा ने दो सीटें अपने सहयोगी दलों जदयू और लोजपा.आर को दी ….दिल्ली के इस विधान सभा चुनाव में लोकसभा चुनाव में इंडिया ब्लॉक का हिस्सा रहीं कई पार्टियां एक.दूसरे के खिलाफ मैदान में हैं…. इनमें आम आदमी पार्टी और कांग्रेस लगभग सभी सीटों पर आमने.सामने हैंण…. कांग्रेस ने दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के खिलाफ 15 साल तक दिल्ली की सीएम रही शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित को उम्मीदवार बनाया है। कांग्रेस ने वहीं भाजपा ने पुर्व मुख्य मंत्री साहिब सिंह वर्मा के बेटे प्रवेष वर्मा को मैदान में उतारा है । भाजपा और कांग्रेस देनों के दावे कि दावा किया है कि आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल खुद अपना चुनाव हार रहे हैं। ये तो 8 को ही उजागर होगा , जनता ने किस पर भरोसा किया हे बता दें कि आप और कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में गठबंधन के तहत दिल्ली में चुनाव लड़ा था।
बीजेपी ने इस बार दिल्ली के चुनाव में जबरदस्त जोर लगाया है। पीएम मोदी से लेकर केंद्रीय मंत्रियों और बीजेपी के मुख्यमंत्रियों ने लगातार रैलियां और प्रचार किया। तो वहीं केजरीवाल समेत आप ने नेताओं ने भी रोड शो से लेकर किए। वहीं कांग्रेस भी इस बार बड़े खेल की उम्मीद के साथ मैदान पर उतरी है जिसने खुद को आप से अलग रखा है।दिल्ली में हो रहे विधानसभा चुनाव के बीच ही एक बार फिर से इंडिया गठबंधन का रार सामने आ गया है। इंडिया गठबंधन और लोकसभा चुनाव में एक दूसरे का सहयोग करने वाली कांग्रेस और आम आदमी पार्टी भी दिल्ली की जंग में आमने सामने है । दिल्ली के चुनाव में 699 उम्मीदवारों में से 96 महिला उम्मीदवार भी शामिल हैं। सबसे ज्यादा 23 उम्मीदवार नई दिल्ली विधानसभा सीट पर हैं। नई दिल्ली विधानसभा सीट इस चुनाव की सबसे हॉट सीट बनी हुई है। जहां तीन प्रमुख पार्टियो के दिग्गज आमने सामने है।
इस बार उसके मुख्य नेताओं अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया की शराब नीति मामले में अपनी भूमिकाओं के लिए गिरफ्तारी के बाद पार्टी के भ्रष्टाचार.विरोधी मुद्दे और छवि को धक्का पहुंचा है।मुख्यमंत्री आतिशी ने पार्टी की छवि को दोबारा पटरी पर लाने की कोशिश की है। साथ ही अपने मुख्य जनाधार को लक्ष्य करके तोहफों की बारिश के साथ अपने कल्याणवादी संदेश पर दोगुनी ताकत झोंकी है। जवाब में भाजपा को अपने कल्याणवादी कदमों पर जोर देने पर ध्यान केंद्रित करना पड़ा है। जबकि कांग्रेस ने अपना खोया आधार दोबारा पाने की काफी कोशिश की है। इसके बावजूद चुनाव अभियान निंदा और कीचड़ उछालने से भरे रहे हैं, और मुख्य मुद्दों खासकर वायु प्रदूषणए से कैसे निपटना है, इस पर किसी का कोई स्पष्ट मत नहीं है। इस बार के दिल्ली प्रचार को देखें तो हम पाते हैं कि इस बार का चुनाव विकास , सुधार से हटकर तू तू मैं मैं जा ही सिमट कर रह गये । वादे तो इतने मनभावन सबने दिये कि मतदाता कनफ्यूज है कि अचानक कौन सा जादुई मंत्र हाथ इन पार्टियो के लगा है जो दस साल में नहीं हुआ वो चुनाव जीतते हो जायेगा । उठा.पटक शांत होने के साथ मतदाताओं को ऐसे उम्मीदवारों को चुनना होगा जो संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठने और इस शहर , जो आज शायद भारत का सर्वाधिक आबादी वाला शहर है, इस शहर के निवासियों की आकांक्षाओं को पूरा करने में सक्षम हों।
देश की राजधानी होने के नाते ऐसा माना जाता है कि दिल्ली में सबसे प्रवुद्ध वर्ग के लोग रहते हैं…..लेकिन एक कहावत है कि चोर चोर मौसेरे भाई, इस बार चुनाव नतीजों से साफ होगा कि एक दूसरे पर छीटाकशी आरोप प्रत्यारोप की राजनीति कर रहे इन सियासी दलों में से दिल्ली का प्रबुद्ध मतदाता किस पर भरोसा जताता है…..